BIT से हनुमान कूद -3

BIT के शुरुआत के दिनों से अगले तीन सालों तक साथियों के साथ मिल जुल कर किये गए हवाई यात्रा, अब अपने ऊँचाई पर आ गयी थी। अब पारा-सेलिंग के लिए आसमान से छलांग लगाने का समय आ गया था। इतने दिनों की पढ़ाई करने के बाद मिलने वाले डिग्री के पैराशूट लगाये हम तैयार तो थे, पर इस तरह से जिंदगी के धरातल पर, अकेले हनुमान कूद लगाने की हिम्मत जुटाने में काफी समय लगा जा रहा था।

कल तक कॉलेज में पढ़ने वाले कई सीनियर्स कभी-कभी वापस कैंपस में दीख जाते थे। उनसे ज़िंदगी की कड़वी सच्चाइयों को सुनने के बाद ऐसा महसूस होता था कि - सिर्फ इंजीनियरिंग की डिग्री से न तो नौकरी मिल पाती है और न ही उस से कोई ख़ास गुज़ारा हो पाता है। अगर किसी तरह से नौकरी का जुगाड़ हो भी जाए तो आगे ज़िन्दगी के फर्नेस में और भी बहुत सारे ईंधन की ज़रूरत पड़ती थी  - जिसका हमें अभी तक कोई अंदाज़ा ही नहीं था- अनुभव होना तो बहुत दूर की बात थी।

BIT से हनुमान कूद -2

Final Year - अब अवसान के दिन आ गए - के तर्ज़ पर हमारे कॉलेज के दिन ख़त्म होने पर थे। पर साथ ही ये समय था, आगे के सफर की तैयारी करने की।

फाइनल ईयर के समय हॉस्टल का माहौल - शादी के अगले दिन के विदाई के समय सा था। हर्ष और विषाद के भावों के समावेश के साथ, हॉस्टल में चल रहे घटनाचक्र की - अगर आज उसकी फिल्म -एडिटिंग की जाती तो बैकग्राउंड में मुकेश के गाये इस गीत को अवश्य बजाया जाता  -
चल री सजनी अब क्या रोये,
कजरा न बह जाए रोते रोते
दुल्हन बन के गोरी खड़ी है,
कोई नहीं अपना कैसी घड़ी है
कोई यहाँ , कोई वहाँ, कोई कहाँ रे…
कहाँ गयी वो फर्स्ट ईयर की शोखियां, वो हल्ला गुल्ला, वो खुलापन, वो हर गम - हर चिंता - हर फ़िक्र - से बेखबर और बेगाने होकर जीने का फन? अब तो हॉस्टल बहुत गमगीन और हताशे से भरा होने लगा था।
गुलज़ार की लिखी पंक्तियाँ वाली हालत थे -

BIT से हनुमान कूद -1

बचपन में आचार्य विनोबा की लिखी एक निबंध -"जीवन और शिक्षण" पढ़ा था। उन दिनों तो इस तरह के निबंध, सिर्फ और सिर्फ परीक्षा में अच्छे नंबर, लाने के लिए पढ़ा जाता था। परन्तु उस उपक्रम में अंदर ले लिये गए इस तरह के ज्ञान के बीज, अब अंदर ही अंदर गहरी पैठ बना चुकी हैं। इतने दिनों बाद, जब उन तथ्यों को आत्मसात कर रहा हूँ, तो लेख की कुछ पंक्तियों बरबस याद आ जाते हैं। इतने साल के अनुभव के साथ आज वे ज्यादा तर्कसंगत लगते हैं।

संम्पूर्ण गैरजिम्मेदारी से संम्पूर्ण जिम्मेदारी में कूदना तो एक हनुमान-कूद ही हुई । ऐसी हनुमान-कूद की कोशिश में हाथ-पैर टूट जाय तो क्या अचरज? - विनोबा भावे

बचपन में पढ़े हुए निबंध या कहानियों में, अपने विचारों को प्रकट करने के लिए जिन शब्दों और मुहावरों को प्रयोग होता था, वे बहुत सटीक और तर्कसंगत होते थे । "हनुमान कूद"- जब पहली बार पढ़ा था, उसी क्षण शब्दों के इस अनूठे अभिव्यक्ति ने मन में एक गुदगुदी सी कर दी थी, और आज भी यह मुहावरा उतना ही ताज़ा और रोचक लगता है। विनोबाजी ने, उन दिनों के शिक्षण पद्धिति पर टिप्पणी करते हुए, अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए बहुत ही सटीक मुहावरा का उपयोग किया था।