BIT कैंपस - 'जिम'

BIT के कैंपस के उत्तरी दिशा में 'जिम'- अर्थात व्यायामशाला है। कैंपस के ज्यादातर भवनों की तरह, इसका निर्माण भी काफी महत्वाकांक्षी लगता था परन्तु रख रखाव के आभाव में उसकी व्यवस्था देख कर लगता था कि  - "हाथी चला गया, हथिसार चला गया - फिर भी हम हाथ में सीकड़ लिये हुए हैं, कि हमारे दरवाजे पर कभी हाथी था।"


 ज्यादातर समय जिम बंद ही रहता था। टूटे फूटे दरवाज़ों में लगे शीशे से अंदर देखने पर, निर्जीव अवस्था में, कुछ व्यायाम के अस्त्र शस्त्र पड़े दिख जाते थे। सामने बरामदे के रेलिंग पर बैठ कर, पैर झूलाते हुए साथ में सिगरेट पीने का आनंद अद्भुत था। बरामदे से विहंगम दृश्य को देखते हुए सामने मैदान के आगे एक बहुत बड़ा खाली हिस्सा दीखता था। रावण दहन के समय खड़े किये पुतले की तरह - बिजली के बड़े बड़े खम्भे, एक दुसरे से बराबर दूरी बनाये, क्षितिज के खालीपन को कम करने की जिम्मेदारी उठाये हुए थे। रेलवे के ट्रेक से लगे हुए बहुत सारे ताड़ के वृक्ष मैदान के सरहद को निर्धारित करती से दिखते थे। सामने सिंदरी फ़र्टिलाइज़र का बहुत ऊँचा चिमनी दीखता था जहाँ से अक्सर गहरा गाढ़ा धुँआ निकलता रहता था।

BIT कैंपस - विहंगम अवलोकन

BIT कैंपस कुल मिला कर गाँव की पुरानी उपेक्षित महिला की तरह थी, जो सालों पहले नयी नवेली दुल्हन की तरह सज धज कर बनारसी साड़ी में होती थी - पर वक़्त बीतने के बाद - चूल्हा फूंकते और घर का काम करते करते, मदर इंडिया की नर्गिस जैसी बेरौनक, बेगाना, वीराना, हक़ीक़त के धूप में मुरझाई और चिंता की चिता में जलती सी बन कर रह गयी थी!

इसमें कोई शक नहीं था कि एक समय इसे देश के श्रेष्ठतम इंजीनियरिंग कॉलेज में शुमार करने के ख्वाब से बनाया गया था - और किवदंती यह है कि खड़गपुर और सिंदरी के बीच IIT और FCI का टॉस, क्रिकेट में बैटिंग या फील्डिंग के निर्णय के तर्ज़ पर, हुआ था- जिसमे अंपायर देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू, और सिंदरी के कप्तान - बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री - श्रीकृष्ण सिन्हा और खड़गपुर का प्रतिनिधित्व बंगाल के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ बी सी रॉय, बहुत भावुकता से किये थे। आगे ऐसा कहा जाता है कि श्रीकृष्ण बाबू इसे IIT का दर्ज़ा नहीं देने पर इतना आहत हुए थे कि उन्होंने इसे IIT से भी बेहतर बनाने का सपना देख कर शायद उसे सपने का क्रमशः भाग में ही छोड़ गए..... महेन्द्र कपूर के गाये एक गाने को आज भी सभी BITians गुनगुनाते रहते हैं - "जिसके सपने हमें रोज़ आते रहे, दिल लुभाते रहे, ये बता दो, कहीं तुम वही तो नहीं"

कैंपस में जितने छात्र थे लगभग उसी तादाद में गाय, भैंस, कुत्ते, सूअर और सियार पाये जाते थे। कैंपस के हर मैदान या वैसे भाग जहाँ से अगर सूअर और कुत्ते जा सकते थे, और जहाँ पाइथागोरस के सिद्धांत को लगाया जा सकता था - विधवा औरत के सिर पर बंजर बालों के बीच में पड़े मांग की तरह - वहां से कच्ची पगडंडियां, सड़को को चिढ़ाती सी, गुजरती थी।

BIT कैंपस - परिसर परिक्रमा

BIT में आकर हमें अब करीब ३-४ महीने हो गए थे। अब तक कॉलेज के फैक्ट्री में सब अपने-अपने "प्रोडक्शन असेंबली लाइन" में लग चुके थे। "आओ झूमे गाऐं, मिल के धूम मचाये, चुन ले गम के कांटे, खुशियों के फूल खिलाएं"- के तर्ज़ पर, सब अपने अपने इन्जिनीयरिंग के खेती के धंधे में लग गए थे। वैसे जिन लोगों ने इस गाने का फिल्मांकन देखा है, वे इस बात को मानेंगे कि इस फिल्म के मुताबिक -
१. भारत के गाँवों में, लोग इकट्ठे होकर, मिलजुल कर एक ही खेत में काम करते हैं,
२. किसानो के झुण्ड में ज्यादा युवावर्ग के होते हैं,
३. नवयुवक और नवयुवतियां कंधे से कंधे, और कई बार गले भी मिला कर,  हँसते-गाते खेती कर लेते हैं।

BIT कैंपस - पहला कदम

Bihar Institute Technology, अर्थात- बिहार प्रौद्योगिकी संस्थान- के कैंपस के अंदर आते ही हॉस्टल # १० के पास ट्रेक्कर को रोक कर हमें हॉस्टल के अंदर जाने का निर्देश दिया गया था। अंदर का माहौल कुछ रेलवे प्लेटफार्म पर प्रतीक्षा करते यात्रियों सा था। ट्रेन लग चुकी थी। सबों को उसी पर सवार होना था। पर अब तक डिब्बों पर आरक्षण तालिका नहीं लगी थी- जिस कारण - अब तक किसी को ये नहीं पता था कि कौन किस डिब्बे में जाने वाले थे। मेरे जैसे बाकी नव आगंतुक, अंदर हॉस्टल में चारों ओर अलग अलग कमरे में, किस्तों में बंटे हुए और बिखरे से पड़े थे। किसी को कुछ ख़ास पता नहीं था कि आगे क्या होने वाला था। सभी सहमे सहमे से - "वहां कौन है तेरा मुसाफिर जाएगा कहाँ, दम ले ले घड़ी भर ये छैयां पायेगा कहाँ " - की भावना से एक चौराहे पर खड़े थे और आगे किस राह को लेना है, इस सोच में पड़े से थे। समय काटने और सामाजिक प्राणी के गुणों का निर्वाह करते हुए, एक दुसरे को पुरातत्व की भावना से खोद रहे थे और जो भी तथ्य हाथ लग रहे थे उन "keywords" से "गूगल" करके उनके longitude और latitude - अर्थात - किस जगह से, किस कॉलेज से, इत्यादि जैसी जानकारी का आदान प्रदान कर रहे थे। आने वाले दिनों में बनने वाली  - '86 बैच आवर्त सारणी (Periodic Table) के, सभी तत्वों(elements) से - हमारी पहली मुलाकात हो रही थी।

अपने सामान को कमरे में एक लॉकर  में रखने के बाद, हम सभी - चींटी की तरह - जिधर बाकी जा रहे थे, उनके पीछे-पीछे निकल पड़े। हम सभी जरुरत के सर्टिफिकेट और दस्तावेजों को साथ लेकर निकले थे। सभी का लक्ष्य -"एडमिनिस्ट्रेटिव ब्लॉक" की ओर पहुँचने का था, जहाँ पहुँच कर BIT में एडमिशन की बाकी बची कार्यवाही को पूरा करने की औपचारिकता करनी थी।

हम में से ज्यादातर लोग अपने लक्ष्य तक पहुँचने के प्रयास में प्रयत्नशील थे। पर मंज़िल के मिलने से पहले ही, कुछ सीनियर्स ने हमें रोक लिया और DPA के सामने बने बड़े से गोलचक्कर के पास हमसे कुछ विेशेष वार्तालाप की शुरुआत हुई। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वे सभी "अग्रज" प्रजाति के थे और  "भाईचारे के भावना" से ओत प्रोत थे, इसलिए उनके मन में हमारे बारे में जानने की प्रबल इच्छा जागृत हो गयी थी।

साधु सरीखे अग्रजों में से एक अति उत्साहित एवं जन-ज्ञान पिपासु सीनियर, मेरी ओर प्रस्तुत हुए और उनके तीन जिज्ञासा-युक्त प्रश्नामृत निम्न थे :
उक्ति # १ - "क्यों बे हीरो, अपना पूरा इंट्रोडक्शन दे?"
उक्ति # २ - "जिस कॉलेज में पढ़ने आये हो, उसका नाम हिंदी में बताओ?"
उक्ति # ३ - "गलत, जिस कॉलेज में अगला चार साल पढोगे उसका नाम तक नहीं पता? ये सभी सामान इधर रख कर" - फिर सामने गोशाला के तरफ के गेट को दिखाते हुए - "सीधे उधर जाओ जहाँ गेट के बाहर हिंदी में नाम लिखा है, उसे देखो, याद करो और फिर इधर वापस आकर मुझे बताओ…"

BIT कैंपस - दस्तक

धनबाद के बैंक मोड़ पर अभी तक ट्रेक्कर पर बैठे बैठे आगे के सफर की कल्पनाओं में गोते लगते लगाते जब झपकी लेने लगा था कि तभी पीछे वाले ट्रेक्कर ने जोर जोर से हॉर्न मारना शुरू कर दिया - जो हमारे ट्रेक्कर वाले के लिए आगे बढ़ने का इशारा था। ट्रेक्कर को आगे बढ़ते नहीं देख, पीछे वाले ड्राइवर ने, भारत के सबसे ज्यादा उपयोग में आने वाले शब्दों का - जिनका प्रयोग आम भारतीय  "अ आ इ ई " सीखने से पहले ही शुरू कर देते हैं- उनके उच्चारण करते हुए, हार्न के करतल ध्वनि के साथ साथ जुगलबंदी शुरू कर दी थी।

पीछे के ट्रेक्कर के छत के ऊपर, एक १०-११ साल का बच्चा, बन्दर की तरह दुबक कर बैठा हुआ था - जो ड्राइवर का हेल्पर था। स्थानीय भाषा में, हेल्पर को "टेनिया" कहा जाता था। फिलहाल टेनिया चीख चीख कर, हमारे ड्राइवर को यह बताने की चेष्टा कर रहा था कि -"संतोषं परमं धनं" का पालन करना चाहिए-  यानी हमारे ट्रेक्कर वाले को जितनी सवारी मिल गया था, उसी में संतोष करके उसे आगे बढ़ जाना चाहिए,  बाकी सवारी पीछे वाले के लिए भी छोड़ दे।

थोड़ी देर में, ट्रेक्कर ने अपने पूरे हिम्मत को दिखाते हुए, सड़क पर चलने का जौहर दिखा दिया। अभी २ मिनट चल कर गाड़ी ने सांस लेना शुरू ही किया था, कि सामने एक स्कूल जाने वाले उम्र के लड़के को देख कर, धीमी हो गई। परन्तु ट्रेक्कर के पूर्ण विराम आने के पहले ही वह लड़का किसी तरह से ट्रेक्कर पर लटक गया था।  उसके प्रयास के सफलीभूत होने का प्रमाण, "टेनिया" ने गाड़ी के छत को जोर जोर से पीटते हुए -"बढ़ा के" ध्वनि अनुमोदन से किया था। सवारी के चढ़ने और उतरने का क्रम इसी तरह से चलता रहा।

BIT कैंपस - दस्तक के पहले का सफर

इन्जीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद काफी गतिविधियाँ हो चुकी थी। BIT सिंदरी में एडमिशन ले लेने के बाद अब कैंपस को कूच करने का समय आ गया था। जमशेदपुर के कुछेक BIT में पढ़ रहे सीनियर्स का भी पता चल चुका था। उनसे सिंदरी तक पहुँचने के बारे में पूरी जानकारियां मिल गई थी।

बस से जमशेदपुर से धनबाद तक के सफर के दौरान, आने वाले चार सालों के लिए, रास्ते में पड़ने वाले शहरों से अवगत हो चुका था। पूरे सफर का सामयिक महत्व जो भी हो - विशेषज्ञों के लिए हार या जीत के भावना से ऊपर उठ कर, जो उत्साह सचिन के खेल की बारीकी का विश्लेषण के लिए होता था - पुरुलिया के आगे पड़ने वाले "सिंह ढाबा" का आलू परांठे और खीर खाने का अनुभव- वैसा ही था ।

धनबाद के "बैंक मोड़" पर बस के रुकने से पहले ही दूर से सड़क पर आड़े तिरछे लगे ट्रेक्कर के जमावड़ा सा दिखने लगा था। ट्रेक्कर वाले के विशेष तरीके से विभिन्न योगासन की मुद्रा में रोड को सुशोभित करने का उद्देश्य - बस के वहां रुकने के उम्मीद से था। और, हर रोज़ की तरह, किसी मैराथन की दौड़ को पूरा करने के बाद हाँफते बस ने,  आज भी ठीक उसी जगह आकर, पिछले ५-६ घंटे से चल रहे सड़क के साथ हो रहे दंगल को - TKO- Technical Knock Out - के रूप में, ख़त्म कर लिया।

बस के रुकते ही खिड़की से छन कर, तरह तरह के शैली और जोश में - "झरिआ, डिगवाडीह, सिंदरी.... " की आती आवाज़ ने, मेरे आगे के सफर का काम आसान कर दिया था। बस से उतर कर जब तक मैं सम्हलता, सिंदरी जाने वाले ट्रेकर के छत पर, मेरा सूटकेस और बैग रखा जा चुका था। इस से पहले मैं कभी ट्रेक्कर नहीं देखा था - लाज़मी था कि उस से कभी सफर भी नहीं की थी - अतः अपने हिसाब से, मुझे ड्राइवर के पीछे वाले सीट पर बैठना ठीक लगा, और मैं उस पर स्वतः आसीन हो चुका था ।

BIT कैंपस तक की यात्रा - सोपान ८: Black Holes - joining the BIT family

Black Holes are believed to form from massive stars at the end of their life times. The gravitational pull in a black hole is so great that nothing can escape from it, not even light. The density of matter in a black hole cannot be measured. Black holes distort the space around them, and can often suck neighboring matter into them including stars.
पिछले ७ गतिविधियों में,  जिसमे करीबन ३५० लोग शामिल थे - कही न कही उन सबके सितारों में कोई एक सा योग होने की प्रबल गुंजाईश है। इतने अलग अलग परिवेश में रहते हुए और अलग अलग प्रक्रिया से गुजरते हुए भी, अंततः हम सभी संभवतः अगस्त १८, १९८६ को अगले चार सालों के लिए, कैम्पस में एक साथ हो गये।

मैं पहली बार जब कॉलेज आ रहा था तो एक साथ अनेक प्रकार के भाव मन में गुजर रहे थे- हर्ष, रहस्य, भय, गर्व, विनीत, और साथ ही बहत सारे पुराने साथी का साथ छूटने का अफ़सोस !

साल भर पहले शुरू किया हुआ सफर तारे के जीवन-काल की तरह था, जो फॉर्म भरने के साथ Nebula के उत्पत्ति से शुरू हुआ था।

विभिन्न अवस्थाओं को पार करते हुए, आगे चल कर हमारे व्यक्तित्व में, एक परिपक्व तारा बनने के जैसा परिवर्तन आते गए!

और अंत में कैंपस में पहुंचे अनेकों तारे मिल कर BIT 86 परिवार बन गए जो एक Black Hole की तरह है जहाँ से - nothing can escape from it और जिसकी - density cannot be measured!

BIT कैंपस तक की यात्रा - सोपान ७: Neutron Stars - admission formalities

Neutron Stars are composed mainly of neutrons and are produced when a Supernova explodes, forcing the protons and electrons to combine."
बिहार इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा के चयन पत्र के अनुसार, मुजफ्फरपुर इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (MIT) में साक्षात्कार - counselling- के लिए उपस्थित होने का निर्देश था। परीक्षा देने के लिए जाते समय के विपरीत, इस बार साथ कोई नहीं था। यह सफर बिलकुल अकेला ही करना था। इस से पहले मैं कभी मुजफ्फरपुर नहीं गया था। और इस बार मुझे ट्रेन के टिकट खरीदने की वैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी भी निभानी थी।

ट्रेन से रात का सफर था। सुबह मुजफ्फरपुर स्टेशन पहुंचने के पहले, तकरीबन हर १०० कदम पर, ट्रेन रुक रही थी। खिड़की से बाहर के दृश्य देखने से मुझे मुजफ्फरपुर, अविकसित शहर और विकसित गाँव के बीच के जैसा बोध हुआ। स्टेशन पहुंचने पर चारों ओर कृषि प्रधान सामान मसलन- अनाज, सब्जी या दूध के बड़े बड़े डिब्बे और इनसे मिलते जुलते अन्य सामग्रियों का बिखराव देखने को मिल रहा था। स्टेशन पहुँचने के पहले ट्रेन को इतनी बार रोका जा चुका था, कि स्टेशन पर मेरे अलावा, सिर्फ ट्रेन के कर्मचारी ही उतरते दिख रहे थे।

BIT कैंपस तक की यात्रा - सोपान ६: Supernova - proof of success arrives

Supernova is the explosive death of a star, and often results in the star obtaining the brightness of 100 million suns for a short time.
२६ जुलाई १९८६ के अखबार के हिसाब से मैं बिहार इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा के सफल परीक्षार्थियों में था। इस बात की पुष्टि के लिए मेरे पास अब तक कोई सरकारी दस्तावेज नहीं था।

इस सुखद घटना को हुए दो-चार दिन हो गए थे। एक दिन सुबह सुबह डाकिया डाक लाया और उसके चेहरे पर किसी टूथ-पेस्ट के विज्ञापन वाली मुस्कान थी। डाकिये ने पुरानी कहावत- "खत के लिफ़ाफ़े से मज़मून को समझ जाते है" - के हिसाब से, इस पत्र को देते देते मुझसे बख्शीश की मांग कर डाली।

डाकिये का हिसाब किताब कर देने के बाद, मोटे कागज़ से बने बादामी रंग के लिफाफे के अंदर, अनेक सारे सरकारी दस्तावेजों की तरह,  कुछ कागज़ों का पुलिंदा मिला। पहले से छपे हुए कागज़ों में, अनेक प्रकार के निर्देश और विवरण थे। हालाँकि पहले पेज पर, कुछ रिक्त स्थानों में हाथ से लिखे हुए विवरण में, मुझे अपना नाम, क्रमांक, और पता देख कर तसल्ली हो गयी थी कि यह मेरे लिए ही आया था। गौर से पूरी क्लिष्ट हिंदी में लिखे पत्र को पढ़ने से, मुझे अपने  मेधा क्रमांक -अर्थात रैंक-  का पता चला। चयन-पत्र के अनुसार   ५ अगस्त, १९८६ को सुबह ९ बजे, MIT, मुजफ्फरपुर में मुझे साक्षात्कार के लिए उपस्थित होना था।

साक्षात्कार के दौरान - "प्रत्येक अभ्यर्थी को उनके मेधाक्रम पर उपलब्ध संस्थान / पाठ्यक्रम में से स्वेच्छानुसार किसी एक संस्थान / पाठ्यक्रम के चयन का अवसर दिया जायेगा।" इसका सामान्य भाषा में अर्थ यह निकलता था कि अपने पसंद के इन्जिनीयरिंग कॉलेज और ब्रांच को चुनने का मुझे मौका मिलने वाला था।

BIT कैंपस तक की यात्रा - सोपान ५: White Dwarf - wait for outcome

White Dwarf is very small, hot star, the last stage in the life cycle of a star.
बिहार इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा के पिंड दान कर लौटते समय, ट्रेन में साथ गए छात्रों की तुलना में काफी कम ही साथ थे। मनुष्य एक "खोजी" जीव है- इसके प्रमाण के तौर पर कइयों ने घर लौटने के अलग अलग जरिये खोज लिए थे। वापसी के दौरान कोई रोमांच या लुत्फ़ उठाने जैसा माहौल नहीं था क्योंकि लौटने के तुरंत बाद कई और इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रवेश परीक्षाओं का सिलसिला कतार लगाये खड़े थे। इस लिए आने वाले दिन कोई सुस्ताने या आराम करने का समय नहीं था - IIT, रुड़की, BIT मेसरा, ISM जैसे और भी कई सारे परीक्षाओं के दंगल में शामिल होने के लिए हम फिर से वर्जिश करने की सोच कर लौट रहे थे।

BIT कैंपस तक की यात्रा - सोपान ४ : Red Dwarf - two day field camp

Red Dwarf is very cool, faint and small star, approximately one tenth the mass and diameter of the Sun and burn very slowly...
इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा में - पहले दिन physics, chemistry और अगले दिन mathematics की परीक्षा होती थी।आम तौर पर आयोजक सभी परीक्षार्थियों के परीक्षा केंद्र शहर से बाहर कही दूर वाले शहर में नियत करते थे। इस कारण हर किसी को कम से कम दो दिनों के लिए - अनजाने से शहर में रहना पड़ता था।

मैं अपने साथियों के साथ परीक्षा केंद्र वाले शहर में एक दिन पहले ही पहुँच गया था। जिसे जैसा समझ में आया उसने अपने लिए वैसा रहने का इंतज़ाम कर लिया था।

मेरे घर वालों ने जमशेदपुर के अपने एक परिचित से बात करके उनके एक दूर के रिश्तेदार, जो इस शहर में रहते थे, उनके घर पर रुकने की व्यवस्था करवा दिए थे। उन दिनों न फ़ोन होता था और न ही इ-मेल की सुविधा थी, अतः हमें पुरातन काल की तरह - उनके एक परिचित के द्वारा लिखित पत्र को - उनके रिश्तेदार के हाथों सुपुर्द करने को कहा गया था।

रेलवे स्टेशन से, जैसा मुझे निर्देश दिया गया था, मैंने एक रिक्शा को ठीक कर लिया। रिक्शेवाले को मैंने मोटी मोटी दिशा-निर्देश कुछ इस तरह से देने की कोशिश की, ताकि उसे मेरे बाहरी होने का बोध न हो- और मुझे बेवकूफ बना कर "लूट" न ले । थोड़ी देर बाद उसने मुझे गंतव्य स्थान पर सही सही पहुंचा दिया।

BIT कैंपस तक की यात्रा - सोपान ३: Red Giant - final preparation lap

Red Giant is a large bright star with a cool surface. It is formed during the later stages of the evolution of a star like the Sun, as it runs out of hydrogen fuel at its center.
एडमिट कार्ड के मिल जाने के पश्चात परीक्षा की आधिकारिक तौर पर तैयारी शुरू हो जाती थी और इसके बाद के दिन से लेकर परीक्षा के दिनों के बीच का दौर बहुत ही उबाऊ और चिंतादायक होता था।

साथ के तैयारी में लगे कुछ इस तरह के जीव भी होते थे, जो तैयारी के अंतिम नाज़ुक क्षणों में कुछेक ऐसे प्रश्नो को लेकर आ जाते थे, जिसे हल नहीं कर पाने के बाद हमारे जैसे पहले से दुखी इंसान - जो एकाध जीवन-दान मिलने के बाद पिच पर बल्ले को घुमाने भर का प्रयास कर रहे होते थे- ऐसे प्रश्नों के बाउंसर से ज़ख़्मी होकर, हतोत्साहित हो जाते थे। इस तरह के आक्रमण से, प्रसिद्द चल-चित्र "गैंग्स ऑफ़ वसैपुर" के संवाद- "तुमसे न हो पायेगा" - जैसे दुर्विचार मन में काले बादल की तरह, घुमड़ घुमड़ कर आने लगते थे। और हम इस धर्मसंकट में पड़ जाते थे कि क्या वाकई एक हारी हुई बाजी को खेलने का कोई प्रयोजन भी था?

BIT कैंपस तक की यात्रा - सोपान २ : Star - obtaining admit card

A star is a luminous globe of gas producing its own heat and light by nuclear reactions (nuclear fusion). They are born from nebulae and consist mostly of hydrogen and helium gas.
जिस तरह से संसार के हर जीव - जिसमे आदम जात भी शामिल होता है - उनको ईश्वर के द्वारा दिए अपने शरीर को चलाने के लिए खाते रहने के अलावा कुछ और ख़ास नहीं करना पड़ता है, उसी हिसाब से फॉर्म भरने के जैसे यज्ञ का अनुष्ठान कर लेने के पश्चात और कुछ ख़ास नहीं करना पड़ा और करीबन डेढ़ महीने के अंदर ही लोगों के परीक्षा का एडमिट कार्ड आना शुरू हो गए थे। परन्तु इसके आने के क्रम का कोई पूर्वानुमेय सा बोध नहीं हो पा रहा था। खुद के एडमिट कार्ड न आने से व्यग्रता अपने चरमोत्कर्ष पर था-  जैसा कि "चलती का नाम गाड़ी" में किशोर कुमार के एक सुकन्या- मधुबाला- से संपर्क की कथा सुन कर उनके मंझले भ्राता रोदन स्वर में गाते थे - "ओ मन्नू तेरा हुआ अब मेरा क्या होगा!"

इस परीक्षा का एडमिट कार्ड एक लॉटरी की तरह था और ऐसा प्रतीत होता था मानो बिहार पर्यटन विभाग की ओर से इस परीक्षा के आयोजकों को निर्देश दिया गया था कि छात्रों को बिहार के हर एक कोने से परिचित कराया जाए। इसी योजना के तहत दक्षिण बिहार (अब झारखण्ड) के परीक्षार्थियों को ग्राम-जीवन से परिचय कराने के पुनीत उद्देश्य से छपरा, दरभंगा, पूर्णिया, कटिहार आदि जैसे - ग्राम और शहर के बीच झूलते से स्थानों में, जो बिहार के मानचित्र में कहीं स्थित है - ऐसा अनायास ही हमने कभी सुना था -  वहां के किसी हाई स्कूल या कॉलेज में परीक्षा केंद्र नियत किया जाता था।

परीक्षा की तिथि और केंद्र के स्थान का पता लगते ही लोग बहुत सामजिक हो जाते थे। उन दिनों, दो तरह के लोग बहुत मांग में होते थे - एक तो वे जो बरसों से परीक्षा देते आ रहे थे , जिस कारण से उनको इन सब जगहों का काफी कुछ पता हो चुका होता था। दूसरे वे लोग, जिनके सगे सम्बन्धी, परीक्षा केंद्र वाले शहर के आस पास रहते थे।

चूँकि उन दिनों - शायद आज भी- बिहार के शहरों में होटल की उपलब्धि नही के बराबर होती थी, अतः मंदिर, धर्मशाला, रेलवे स्टेशन के वेटिंग हाल या किसी रिश्तेदार के घर पर रहने के अलावा, परीक्षार्थियों के पास और कोई खास विकल्प नहीं होते थे।

यह कहना अतियशोक्ति नहीं होगी कि कई सालों से इस तरह के परीक्षाओ को देते आ रहे अनुभवी परीक्षार्थियों को - जो कई युगों से खेलते आये दिग्गज रणजी खिलाडियों के सरीखे थे - लगभग बिहार के सारे सुदूर शहरों के और उनके आस पास के परीक्षा केन्द्रों का व्यक्तिगत अनुभव होता था। अपनी इस उपयोगिता के कारण -हम ग्वाले से याचकों के समक्ष - वे दुधारू गाय की तरह खड़े हो जाते थे और अपने सामान्य ज्ञान की दुग्ध दे कर हमें तृप्त कर देते थे।

इस तरह से इस परीक्षा के आयोजको के एडमिट कार्ड में परीक्षा केंद्र के लिए अफ़लातूनी शहरों का चयन कर हमें भेजने के बाद, समाज में भाईचारा के बढ़ने जैसे उद्देश्य की पूर्ति हो जाती थी और साथ ही लोगों को बिहार के हर प्रान्त की जानकारी होना भी शुरू हो जाता था।

परीक्षा का नतीजा जो भी हो, इस बहाने कई शहरों का लोगो को व्यक्तिगत अनुभव हो जाता था और उन शहरों के विशेषताओं का भी ज्ञान हो जाता था - जो कहीं किसी किताब में नहीं मिल सकती थी - मसलन भागलपुर के मच्छरों के इतने शक्तिशाली होने का और उनकी प्रबल जनसंख्या का मुझे कदापि ज्ञान नहीं होता, अगर मैं इस परीक्षा में शरीक नहीं हुआ होता, क्योंकि मेरा परीक्षा का केंद्र उस शहर का टी एन बी कॉलेज था!

BIT कैंपस तक की यात्रा - सोपान १ : Nebula - application form hurdle

A nebula is a cloud of gas (hydrogen) and dust in space. Nebulae are the birthplaces of stars.
बिहार के संयुक्त प्रवेश परीक्षा के आवेदन पत्र को भरना काफी गहन कार्यक्रम सा था। इस काम में बहुत धैर्य की जरूरत थी और आवेदन पत्र के सारे निर्देशों को अनेकों बार ध्यान पूर्वक पढ़ने के बावजूद एक-दो ऐसे भाग थे जिनका हमारे जैसे सामान्य बौद्धिक स्तर वाले इंसान को कुछ भनक नही लग पाया था।

उन दिनों तक समाज एक जीवित संस्थान ही था और समाज के परिभाषा के अनुरूप - "संस्थात्मक प्रतिमान (पैटर्न) में मानव समूह, जिसके सदस्य एक दूसरे से अंतःसंबंध के कारण संपर्क में आते हैं" - लोग आपस में बातें करते थे और आस पास के लोगों से संपर्क कायम रखते थे।

BIT कैंपस तक की यात्रा

आने वाला कल बस एक सपना है,
गुज़रा हुआ कल बस एक अपना है,
हम गुज़रे कल में रहते हैं,
यादों के सब जुगनू जंगल में रहते हैं।
(कैफ़ी आज़मी के लेखनी से "फिर तेरी कहानी याद आयी" चल-चित्र की गीत)
कभी कभी यादों में खो जाता हूँ और बीते सालों को, अब जब स्लो मोशन में देखता हूँ तो - टीवी पर दिखाए क्रिकेट के टेलीकास्ट की तरह खिलाड़ी के फुटवर्क, जल्दी चलाये शॉट्स या और बाकी बारीकियों की तरह - अपने ज़िंदगी के हरेक वो दौर याद आने लगते हैं जिसने जिंदगी को अनेक दिशाएं दी।

आज से ३० साल पहले की ज़िंदगी की कल्पना करने से ऐसा एहसास होता है - जैसे रंगीन टीवी के दौर में कोई B&W सिनेमा को देखने का प्रयास किया जा रहा है। स्कूल से निकल कर +2 या इंटरमीडिएट में आने के बाद हकीकत की दुनिया में सहमे सहमे से कदम अभी रखना शुरू ही किया था कि आने वाले दुनिया की कल्पना मात्र से रातों के नींद उड़ने लगी थी। उन दिनों जब अपने इर्द गिर्द के बेरोजगारों की समस्या और उन सबके बीच इन्जिनीयरिंग या मेडिकल की पढाई करने वाले के उज्जवल भविष्य को देखते थे तो स्वयं - प्रेरित होकर या डर से- पढाई को बहुत गंभीरता से लेने लगे थे!

इतने सालों के बीत जाने के बाद अब तो BIT कैंपस में बिताये चार सालो की यादें भी धूमिल सी होने लगी है -पर उस से पहले का कैंपस तक के आने का सफर भी काफी लम्बा और रोचक था।

BIT के कैंपस आने के पहले हमलोग आने वाले चुनौतियों से बिल्कुल अनभिज्ञ से थे। आज भले उन दिनों को याद कर हम सिर्फ मुस्करा के आगे बढ़ जाए, पर उन दिनों सभी मंज़िलों को एक-एक कर पार करते जाना "सफलता के सोपान (step)" की तरह था और हर कदम पर हम परिपक्व होते गए।

यह पूरा सफर तारे के जीवन-काल की तरह है, जो फॉर्म भरने के साथ Nebula के उत्पत्ति से शुरू हुआ, जो विभिन्न अवस्थाओं को पार करते हुए,  आगे चल कर एक परिपक्व तारा बन गया और कैंपस में पहुंचे अनेकों तारे मिल कर BIT 86 परिवार बन गए जो एक Black Hole की तरह है जहाँ से - nothing can escape from it और जिसकी - density cannot be measured!