सुनहरी यादों के चिराग से निकला - Mech '86 का जिन्न - २

अब तक आपने हमारे Mechanical '८६  के आधे लोगो के बारे में यहाँ पढ़ा था और अगर आप इसे पढ़ रहे हैं तो जाहिर है बाकी के बारे में भी जान ने को काफी उत्सुक होंगे, तो बिना किसी और रूकावट के इधर हाज़िर है  - दूसरा भाग - 
३६. प्रदीप कुमार चौधरी -  दीपू , अब इस दुनिया में नहीं रहे! यह अत्यधिक दिल को दुखाने वाला अनुभव है। आज भी मैं जब उसे याद करा रहा हूँ तो ऐसा लगता है कि वो अब भी यही कही अगल बगल है! यकीन ही नहीं होता की अब वो कभी नहीं मिलेगा! दीपू बहुत ही संवेदनशील और कम बोलने वाले लोगो में से था। दीपू अनजाने में भी किसी का अहित नहीं कर सकता था! काम बोलता था मगर जब भी कुछ बोलता था - उसमे हंसी के इतने पुट होते थे कि आज तक उसकी बातों पर हंसी आती है! हमेशा मुस्कराता से, पर कही खोया और अकेला सा रहता था। कॉलेज के दिनों में पढाई में ज़रा पिछड़ जाने के बाद इसने अदम्य साहस का परिचय दिया और इतनी पढाई की कि बाद में यह प्रोफेसर ही बन गया था!

सुनहरी यादों के चिराग से निकला - Mech '86 का जिन्न -१

आम तौर पर - "ज़िंदगी के सफर में गुज़र जाते हैं जो मकाम, वो फिर नहीं आते" के तर्ज़ पर, कॉलेज से एक बार घोंसला छोड़ के निकल जाने के बाद, सभी लोग आज़ाद पंछी की तरह दूर गगन में -बहुत दूर के सफर में निकल जाते हैं ! ऐसे में मुलाकात की सम्भावना कम ही रह जाती है। ऐसे ही कारणों से हमें भी एक दुसरे के बारे में कॉलेज से निकलने के बाद, करीब २० सालों तक कुछ ख़ास पता नहीं था।

BIT के '८६ सत्र में वाकई बहुत ही अलग किस्म के लोग थे! पर अनेको कारणों से, हमारे Mechanical '86 में और भी खुछ ख़ास हुआ करता था। कॉलेज के दिनोंं में भी Mechanical बदनाम से थे, क्योंकि अगर कैंपस में कहीं भी 'निकम्मों' का कोई झुण्ड दिख जाता था, तो बहुत ज्यादा संभावना थी कि उनमे ज्यादातर Mechanical का ही कोई न कोई होगा। कॉलेज में 'आवारागर्दी' करते हुए , जाने कब सभी ठीक ही ठाक से pass कर गए। कॉलेज से निकलने के बाद, Mech '86 के सभी भक्त-जन, दुनिया के अनेकों कोने में बिखर गए हैं!

वैसे तो मैं अपने बैच के सभी लोगों के साथ बहुत मस्ती की थी, पर अपने ब्रांच के लोगों के साथ ज्यादा समय बिताया। इस कारण, उनसे कुछ ज्यादा घनिष्टता बढ़ गयी थी। शायद इसका कारण यह हो सकता है कि हमें - 'मज़बूरी' में - सेशनल, प्रोजेक्ट और अन्य क्रियाकलापों के कारण - ज्यादा समय, एक साथ गुज़ारना पड़ा था।

पढाई, नौकरी और शादी - भाग -4

BIT कैंपस में खुशी को मनाने के कुछ सीमित विकल्पों में से जो सबसे सस्ता और सर्वस्वीकार्य था वह ढाबे में समोसा, जलेबी और चाय की पार्टी। इस पार्टी की ख़ास बात यह होती थी कि ये किसी भी अकस्मात् खुशी के खबर मिलते ही तत्क्षण दी जाती थी।आम तौर पर इस तरह के पार्टी के दौरान  - सड़क पर हुए किसी हादसे में बिना कुछ किये ही इर्द गिर्द के प्रत्यक्षदर्शी "material interest" बन जाने की तरह, ढाबे पर बैठे कई लोग भी अनायास ही पार्टी का हिस्सा बन जाते थे। इस तरह के पार्टी में, लोगो की संख्या बढ़ती ही न चल जाए, इसलिए पार्टी देने वाला मौका मिलते ही ढाबे से भागने के चक्कर में होता था।

एक दिन इसी तरह के अचानक से हुए एक पार्टी का मैं भी हिस्सा बन गया। सफ़ेद चीनी मिट्टी के बने तश्तरी - जिसके किनारे के कई हिस्से टूट टूट कर अपनी आयु बता रहा था - जिस पर, "हिम्मत है तो मुझे कुछ देर तक यूँ ही देखते रहो", बोलता हुआ समोसा मेरे सामने आ गया था। पता चला कि यह अप्रत्याशित भेंट हमारे एक सीनियर चौधरी जी के सौजन्य से था जो अपनी शादी ठीक होने की खुशी - या जबरन खुश करवाये जाने - के एवज में था । आगे यह भी बताया गया कि लड़की अमेरिका में थी… यानी चौधरी जी के कॉलेज से निकलते ही हवाई जहाज का टिकट का प्रबंध हो चुका था और फिर सात समंदर पार! मतलब समय अब काफी कम था और इस से पहले कि चौधरीजी धरातल से ऊपर टेक ऑफ़ कर ले, लोगो ने उनको पकड़ लिया था और BIT के भाषा में उनका "मोचन" किया जा रहा था।

-----अतीतावलोकन (फ्लैशबैक)----- 

एक साल पहले तक, हॉस्टल १३ में चौधरी जी मेरे ही कमरे के सामने रहते थे। उन दिनों चौधरीजी 3rd year में थे और मैं 2nd ईयर में था। हम में से कुछ लोग सीनियर्स के हॉस्टल के बचे खाली single rooms  में - गाज़ा स्ट्रिप में बसाये गए फिलीस्तीनियों की तरह - पुनर्स्थापित कर दिए गए थे। सीनियर्स के साथ काफी हद तक घुलने मिलने के बावजूद, एक साल पहले तक उनके द्वारा रैगिंग किये जाने और बाकी वजहों से भी हम स्वतः एक सहज दूरी बना कर ही रहते थे।

पढाई, नौकरी और शादी - भाग -3

BIT के तीसरे साल तक आते आते अपने बैच में कई लोगो की शादी हो चुकी थी और ये भी एक आम बात सी हो गयी थी कि कइयों के घर पर उनके शादी के रिश्ते आ रहे थे। वैसे भी तीसरे साल तक आते आते कैंपस की हालत ये थी कि "बचे खुचे lot" की "अब इन्हें दवा नहीं दुआ की जरुरत है" वाली हालत थी - मतलब हॉस्टल में दवा-"दारू" और कइयों के घर पर बड़े बूढ़ों के दुआ से शादी की बात चालू थी।

Arranged Marriage एक सामुदायिक कार्यक्रम होता था और इसमें वैसे सभी लोग - जिनकी ज़िंदगी दीवार के खूंटे में टंगे कपड़े जैसी थी - मतलब वैसे लोग जिनको उनके अपने घर के पहनने वाले ने उतार कर टांग कर किनारा कर दिया था, वैसे लोगों को इस तरह के काम में बहुत दिलचस्पी होती थी। वैसे भी चाय नाश्ते पर किसी के घर का एक चक्कर लगा कर आने में किसी को ख़ास बुरा नहीं लगता था। शादी के लिए किसी के घर पर पहुँच जाना आज के फेसबुक पर कैंडी क्रश या farmville के request भेजने जैसी हालत थी!

उन दिनों समाज में शादी करने से ज्यादा, शादी करवाने वाले हुआ करते थे। ऐसा प्रचलित मान्यता थी कि उन दिनों किसी परिवार के कन्यादान करवाने में सहयोग करना -गुरूद्वारे में कार-सेवा या NGO की मदद करने के जैसा नेक काम होता था, और इसमें सहयोग देना परम पुण्य का काम होता है।

परसाईजी का एक लिखा एक संवाद याद आया-"हमारे मुल्क की आधी ताकत लड़कियों की शादी करने में जा रही है।"

पढाई, नौकरी और शादी - भाग -2

2nd ईयर के दौरान मुझे भी अपने बैच के एक मित्र के शादी का न्योता मिला। मैं कॉलेज के कुछ और साथियों के साथ जीवन के एक नए अनुभव को लेने चल पड़ा था - दोस्त की शादी ! हमउम्र के शादी की सोच ने उन दिनों हमारे अंदर अनेक सारे गुदगुदी शुरू कर दी और कई कारणों से हमें भी लगने लगा था कि हम "मंज़िल" के काफी करीब थे! Long Live Arranged Marriage System !! अगर उन दिनों इस तरह की विवाह की व्यवस्था नहीं होती तो हम में से ज्यादातर लोग, आज भी अबंड की तरह भटकते रहते और कोलम्बस की तरह भारत के खोज के क्रम में कितने सारे नए continents की खोज कर चुके होते!

भारतीय शादी में दूल्हे का होना तो अपरिहार्य है और इसलिए सर्वोपरि है, पर ब्रिटेन के संविधान की तरह अलिखित किन्तु सर्वमान्य प्रथा सी है कि दूल्हे के बाद खातिरदारी और महत्वता के क्रम में-  दूल्हे का बहनोई, भाई, पिता के साथ साथ दोस्तों का स्थान शीर्ष पर व्यवस्थित होता है। इस बात की जानकारी सबों को होती है बस - "first among equals" के लिए जरा प्रयास करना पड़ता है  - जिसका तात्पर्य है कि आप जितना "चौड़ा" हो सकते हैं, उसी अनुपात में खातिरदारी में इजाफा लाया जा सकता है।  क्रिकेट के हर ओवर में ६ गेंद होता है, मर्जी आपकी कि आप हर गेंद पर छक्का मारें या सुरक्षित उन्हें विकेटकीपर के दस्ताने में जाने दें!

मगर हमारे "दूल्हे" मित्र ने हमें किसी भी तरह के मेहनत से निश्चिन्त कर दिया था। अपने घर, या जैसा हमें बाद में लगने लगा था, सारे गाँव में पहले से ही एलान कर दिया था कि हमें किसी भी तरह की शिकायत करने का मौका नहीं मिलना चाहिए। तदानुसार उनके निर्देश का अक्षरशः पालन किया जा रहा था। हमारे दोस्त के गाँव के सबसे नज़दीक वाले रेलवे स्टेशन तक आते आते हम रेल में अल्पसंख्यक हो गए थे, और रेल के डिब्बे के अंदर, वैसे ही दिख रहे थे जैसा शोले में गाँव वालों के बीच में शर्ट -पैंट पहने जय-विजय!

पढाई, नौकरी और शादी - भाग -१

हर दौर की अपनी प्राथमिकताएं होती हैं और साथ में चुनौतियाँ भी । मिसाल के तौर पर पुराने दौर के सिनेमा की पटकथा उन दिनों की ज्वलंत समस्या पर आधारित होते थे - जैसे  "एक फोन की कमी के कुपरिणाम" के पृष्ठभूमि पर अनगिनत सुपर हिट सिनेमा बन चुकी हैं।एक कोने से दूसरे कोने तक खबर पहुँचाने में आने वाली दिक्कतों के कारण,  विलेन जैसे "नेटवर्क टावर्स" के द्वारा "कॉल टैपिंग" करने जैसे जघन्य अपराध, और उसके आधार पर सभी पात्रों के बीच भ्रम और अविश्वास लाने जैसे रोमांचकारी तथ्यों पर बनी कहानियां उन दिनों सिनेमा हॉल में दर्शकों को ३ घंटे तक बांधे रखने में सक्षम हो जाते थे!

परन्तु हरेक युग में कुछ outliers भी होते हैं - जिन दिनों गाँव की अभागी और अबला नायिका एक चिट्ठी  भेजने के लिए पूरी फिल्म के दौरान तरसती रहती थी, उन दिनों  1949 में बनी फिल्म "पतंगा" अपने समय से काफी आगे की थी क्योंकि इस फिल्म में एक गाना है  - "मेरे पिया गए रंगून", जहाँ इस बात पर बार बार जोर दिया गया है कि पिया "रंगून" गए हैं और उनको "फून" किया जा रहा है…   - आज की तरह whatsapp पर emoji भेज कर अपने सुख दुःख का इज़हार करने जैसा नहीं, अब इस परिपेक्ष्य में उन सिनेमा को देखना एक उबाऊ सा काम लगता है।

इस बात को मानने में काफी दिक्कत पेश आती है कि हमारे कॉलेज छोड़ कर निकल जाने के बाद दुनिया बहुत बदल चुका है।  कैसेट प्लेयर, फिल्म रोल वाली फोटोग्राफी, डाक घर में जा कर पोस्टल टिकट खरीदना, टेलिग्राम-तार भेजना, डाकिया के चिट्ठी का इंतज़ार, दूर किसी से बात करने के लिए STD बूथ पर खड़े रहना, टाइपिस्ट के पास जा के अपने प्रोजेक्ट्स को टाइप करवाना और न जाने कितने सारे हमारे दैनिक दिनचर्या की गतिविधियाँ या उन दिनों के हाई एंड टेक्नोलॉजी अब इतिहास के पन्नों में दबे, अपना गौरवशाली "भूत" और "मानव सभ्यता को इन सभी का देन"- जैसे विचारो से ग्रसित, मोक्ष प्राप्त कर भविष्य के शोध के विषय बन कर रह गए हैं। आज के दिन हमें अपने बच्चों को, उन दिनों के कुछ बहुत ही सामान्य से लगने वाले उपकरण और उनका उपयोग के बारे में बताने में भी कष्ट होता है क्योकि वो उनके सोच के realm के बाहर की बातें हैं।

संभव है कि जब मैं कुछ पुराने दिनों का विवरण देता हूँ,  तो कई बाते आज के इस हमारे दौर में वैसी ही अप्रासंगिक लगे!

श्रद्धा सुमन - Dr. R. N. Sahay

Dr Raghu Nath Sahay या फिर डॉ आर एन सहाय के नाम से पहचाने जाने वाले हमारे ex - director और प्रोफेसर अब नहीं रहे. ईश्वर उनकी आत्मा को चिर शांति प्रदान करे. मेरे अंदाज़ से वे करीब 80 + के रहे होंगे और एक भरी पूरी जिंदगी जी कर गये होंगे.

सहाय सर 1954 मैकेनिकल इंजीनियरिंग बैच के के थे और शायद वे BIT के शुरुआत के बैच के चंद जीवित बचे छात्रों में से एक रहे होंगे।

हमारे कॉलेज के शुरुआत के दिनों में डॉ सहाय मैकेनिकल के HOD हुआ करते थे। इन दिनों कालेज के डाइरेक्टर डॉ जनार्दन झा होते थे, डॉ झा के बारे में बात करते ही उनके soil test में उनके विशिष्टता और Russia से उनके सम्बन्ध का जिक्र आवश्यक सा है (किवदंती के तौर पर इस बात का प्रचलन था कि डॉ झा के soil test के विशेष ज्ञान,जो आम लोगों में नहीं होता था, उसके वजह से उन्हें देश विदेश से बुलावा आता रहता था )। डॉ झा काफी उदासीन से डायरेक्टर थे और कॉलेज की क्रिया कलापों में उनकी रूचि परीक्षा में सिर्फ अनिवार्य प्रश्नों को ही हल करने की तरह सिर्फ आवश्यकतानुसार हुआ करता था।

डॉ सहाय हमारे डीन ऑफ़ स्टूडेंट हुआ करते थे और बहुत ही सक्रिय प्रोफेसरों में से एक थे। छात्रों के बीच उनकी अच्छी पैठ थी। ऐसा हमें बताया गया था कि अपने कॉलेज के दिनों में डॉ सहाय बहुत अच्छे फुटबाल के खिलाड़ी हुआ करते थे और साथ ही वे जरा "हटके" थे, यानी अपने छात्र जीवन में पढाई के अलावा उनकी दिलचस्पी जरा दबंगई में भी हुआ करता था। इस कारण से जब वे प्रोफ़ेसर बने तो हमेशा छात्रों के पक्ष में रहते थे।

डॉ सहाय खुद एक रोटेरियन थे और कॉलेज के रोट्रैक्ट क्लब के पैट्रन भी होते थे। सभी क्लब के द्वारा प्रायोजित क्रिया कलापों में डॉ सहाय काफी रूचि लिया करते थे। अपने छात्र जीवन के अनुभव के तकाजे से "जिस स्कूल के तुम स्टूडेंट हो वहाँ के हम प्रिंसिपल रह चुके हैं" इस सिद्धांत से जब कभी वे हमसे बातें करते या हमारी हुड़दंगबाजी को सम्हालते थे, उन मौकों पर उन्हें "हम उड़ते चिड़ियों के पर गिन लेते हैं " जैसी feelings आती होंगी। कई बार जब कॉलेज की स्थिति बेकाबू होने लगता था, तो वे बहुत सक्रिय होकर हम लोगो से बाते करके स्थिति को सम्हालने की कोशिश करते थे, और कई बार सफल भी होते थे।

कैंपस के वो हसीं लम्हे… भाग 7 - सुदामा

एक बहुत ही रोचक पात्र का रामायण में वर्णन आता है जो निस्स्वार्थ भाव से सेवा करते हुए स्वयं को धन्य समझता है, जिसने प्रभु को नदी पार कराने के पारिश्रमिक के रूप में उनके चरणो को धोने का काम ही माँगा था । जब मैंने पहली बार इस पात्र के बारे में पढ़ा, तो स्वयं से प्रश्न किया कि क्या केवट सिर्फ एक काल्पनिक पात्र था या वास्तविक जीवन में भी कोई ऐसा होता होगा जो अपने काम के प्रति इतना समर्पित होता हो।

BIT के हॉस्टलों में रहते हुए हम कई मायनों में वार्ड सर्वेंट्स पर लगभग आश्रित से हो गए थे। आम तौर पर हमें सुबह उठते ही चिल्ला कर उन्हें बुलाने की या डाँटने की लगभग आदत सी हो गयी थी। वार्ड सर्वेन्ट्स भी बाबुओं की कमज़ोरी जानते थे और उन्हें पता था कि उनकी सबसे ज्यादा जरुरत सुबह होती थी, जब लोगों को पीने का पानी, कमरे में झाड़ू लगाना और बाकी दिन भर के कुछ और काम बताने की जरुरत होती थी।

कैंपस के वो हसीं लम्हे… भाग 6 -फल वाला

Hostel में खाने की समस्या, बचपन में समाज शास्त्र में पढ़ाये जाने वाला विषय - "भारत के पिछड़े होने के अनेक कारणों में से प्रमुख खाद्यान की आपूर्ति में आत्म-निर्भर न होना" का ही एक सूक्ष्म रूप में व्यापक समस्या का द्योतक था. कैंपस में और हॉस्टल में और भी अनेक तरह की समस्याएं होती थी परन्तु - रोटी, कपडा और मकान में से ऐसा प्रतीत होता था कि हमारे लिए तीसरे की समस्या तो नहीं थी, परन्तु हमारे "मकान" में जल का नितांत अभाव रहता था और हमारे जीवन में हैंड पंप के महत्व का ज्ञान प्राप्ति हुई.

जहां आभाव है वहीं विकल्प भी पनपते हैं. इस क्रम में, हर समस्याओं का निदान के रास्ते बनते चले गए और ४ साल कैसे पार हो गए हमें पता भी नहीं चला. हॉस्टल के खाने की समस्या का निदान को, तीन सतहों पर समझना पड़ेगा -

कैंपस के वो हसीं लम्हे… भाग 5 - संजय वार्ड सर्वेंट

Hostel # 3  का शायद सबसे कम उम्र का एक वार्ड सर्वेंट हुआ करता था- संजय। सेना के नए रंगरूट सा बिलकुल चुस्त और फुर्तीला सा संजय तड़के सभी रूम को खटखटाता था और अगर खुला तो झाड़ू लगाता वरना आगे बढ़ जाता और आनन फानन में सभी रूम के बाहर रखे बाल्टी में हैंड पंप से पानी को भरता हुआ सबसे पहले हॉस्टल से गायब हो जाया करता था.

देर से उठने वाले प्राणियों को गुस्सा आता था क्योंकि कइयों को सिगरेट मंगवाना होता था या कोई और काम. कई बार सुदामा, जो उसी हॉस्टल का एक दूसरा वार्ड सर्वेंट हुआ करता था वही उसके हिस्से का काम कर दिया करता था.

अचानक से एक दिन खबर आया की संजय ने मैट्रिक का इम्तिहान पास कर लिया है. विषमताओं के बीच इस तरह के अदम्य साहस, उसकी लगन, निष्ठा और कड़े मेहनत को याद कर आज भी जी करता है कि उसे गले से लगा लूँ और उस से प्रेरित हो कर कुछ मैं भी ताकत पा लूँ!

कैंपस के वो हसीं लम्हे… भाग 4 -अवधी दरबान

BIT कैंपस में पहली बार जब भी कोई कदम रखता, उसकी नज़र सबसे पहले हॉस्टल १,२,३ पर पड़ती थी जो अंतिम वर्ष के छात्रों के लिए होता था. इन तीनों हॉस्टल का विश्लेषण बचपन में गाय पर निबंध लिखने के लिए सिखाये गए उन सभी पहलुओं से बिलकुल ही तर्कसंगत बैठता था :

१. जैविक - चार साल घिस लेने के बाद अकेले कमरे में रहने की स्वतंत्रता,
२. सामाजिक - इस हॉस्टल के सामने से मेन रोड जाने के कारण कम से कम अंतिम वर्ष ये एहसास कराना आवश्यक है कि अब छात्र कॉलेज से निकल कर वापस समाज में एक जिम्मेदार नागरिक की तरह जीवन यापन करने जा रहे हैं,
३. प्रासंगिक - आम तौर पर कॉलेज के सेशन की हालत भारतीय रेल की तरह ही रहती है और अंतिम साल के ऊपर उसैन बोल्ट की तरह पूरी दम ख़म लगा के जीताने का लक्ष्य होता है जिस कारण देर शाम और सप्ताहांत में भी क्लासेज होती रहती हैं और कैंपस के बीचो बीच रहने से समय और दूरी की बचत होती है

कैंपस के वो हसीं लम्हे… भाग 3 -मिठाईवाला

BIT का कैंपस बहुत विस्तृत क्षेत्रफल में फैला हुआ था। हरेक होस्टल "राम राज्य" की तरह, ताला संस्कृति से विरक्त, बिलकुल खुला सा होता था। बावजूद इसके, कैंपस से बाहर के तत्त्व, जिन में युद्ध विराम का प्रस्ताव ले के जाने वाला जैसा आत्म-विश्वास होता था, वैसे फेरीवाले ही अपना सामान बेचने हॉस्टल के अंदर या आसपास आते थे.

कुछ फेरीवाले हॉस्टल ११ (girls hostel) की तरह अपवाद थे। वे अपने लिए स्थाई जगह बना लिए थे, जैसे गन्ने का रस निकालने वाला या कैंटीन के बगल का पान दुकान, परन्तु बाकी घूम घूम कर अपने सामान को बेचते थे.

कैंपस के फेरीवाले का बिजनेस मॉडल और चरित्र रेलवे स्टेशन के फेरीवालों से मिलता जुलता था, ट्रेन के रुकते ही सामान बेचने का सिलसिला शुरू हो जाता था. कुछ जो सिर्फ आम छात्रों की तरह पढाई की खाना पूरी करने कॉलेज आये थे, वे ट्रेन के एक सिरे जो गार्ड का डिब्बा होता था, उस छोर से इंजन तक का एक चक्कर लगा के end term exam की तरह अगले ट्रेन के रुकने का इंतज़ार करते थे. मगर मेघावी छात्रों की तरह, कुछ फेरीवाले स्टेशन पर जब तक ट्रेन रुका हो, तब तक जितनी बार संभव हो एक सिरे से दूसरे सिरे का चक्कर लगाते ही रहते थे, ये पुनरावृति का सिद्धांत "जिन ढूँढा तिन पाइयाँ, गहिरे पानी पैठ।जो बौरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ॥" से प्रेरित था। मेघावी छात्रों का भी विश्वास होता था कि जितनी बार डुबकी लगाएंगे, उन्हें कोई नए ज्ञान की प्राप्ति होगी। परन्तु मेरे जैसे विद्यार्थी को, पानी से ही बहुत डर लगता था, और हमारे जैसों के लिए नदी के चक्कर में न पड़ कर बस उसे पार कर अगले किनारे तक जाना ही मकसद था! हॉस्टल में आने वाले कुछ फेरीवाले भी थे, जो दिन में कई मर्तबा चक्कर लगाते रहते थे की क्या जाने कोई नया खरीद हो जाए !

कैंपस के वो हसीं लम्हे… भाग २ - रमण सिंह

Hostel - 13 में एक वार्ड सर्वेंट होता था रमण सिंह जिसने पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए घर में अनगिनत बेटियाँ के झुण्ड लगा दी थी.

पैसे की तरह बाल की भी कमी सा गंजा सिर, हफ्ते में एकाध बार याद आने से शेविंग करने वाली स्थिति से झलक रही विवशता की तरह पचके गाल और उन पर बेतरतीब बढे समस्याओं सी दाढ़ियाँ! मगर लगान सिनेमा के बग्घा की तरह, जो भयानक गरीबी और सूखे को झेल रहे बस्ती में भी जश्न मानाने के जोश से नगाड़ा पीटता रहता था, लगभग उसी जोश और मुस्तैदी से उसके हौसला को दर्शाता उसकी लम्बी लम्बी मूंछे, जो उसके चेहरे को देखने पर एक राहत सी देती थी कि ज़िंदगी थकी जरूर है पर अभी रुकी नहीं है।

हॉस्टल के बाबुओं की सेवा में उतने ही जोश से तत्पर दुबला पतला मगर चुस्त सा रमण मौसम से मानो बेखबर हर वक़्त अपने शरीर पर एक पुरानी गंदी से ऊनी स्वेटर पहना होता था जो ऐसा लगता था कि उसके शरीर का वह एक अभिन्न हिस्सा बन चुका था.

कैंपस के वो हसीं लम्हे… भाग १ - B Zone के बाबा

BIT के दौरान कैंपस में अनेक तरह के लोग मिले थे पर कुछ ख़ास तरह के व्यकितत्व थे, जाने अनजाने यादों के झरोखे को जब भी खोलता हूँ बरबस इनकी यादें आंखो मे तैरने लगता है :

'बी' जोन के हॉस्टल १६ के मेन गेट से अंदर घुसते ही दाहिने और एक स्टोर हुआ करता था जो एक तरह से 'ए' जोन के मेहता स्टोर का एक पर्याय जैसा था। उस स्टोर में हर तरह के रोज़मर्रा की सामान मिलती थी जो 'बी' जोन के सभी हॉस्टल में रहने वाले के जरूरत आ सकती थी। आम तौर पर सेशनल के जर्नल कवर सबों के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता सी थी और वो यहाँ मिलता था। "टोपोलॉजी" के लिए आवश्यक टी स्क्वायर, इंजीनियरिंग ड्राफ्टिंग पेपर, एच, २-एच, एच बी से लेकर जापानी तकनीक से बनी लीड वाली, हर तरह के पेंसिल के प्रकार वहाँ मिलते थे। उस जमाने के हिसाब से प्रचलित तरह तरह के जिल्द लगे हुए नोट बुक भी वहां बिकता था।  


नोट बुक के जिल्द पर वैसे सभी विषयों के तस्वीरें होती थी जो मन को सदैव लालायित करता रहे कि जीवन में पढाई से हट के भी बहुत कुछ और करने को है। ज्यादातर किसी पसन्दीदा क्रिकेट खिलाड़ी, स्विट्ज़रलैंड या ऐसे ही किसी खूबसूरत जगह ,तोता, बाज़, मोर या कोई और पक्षी, किसी खूबसूरत प्रसिद्ध अभिनेत्री, बिलकुल एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन या किसी और अभिनेता के चित्रों का प्रचलन होता था।  

कुछ लोगों की भावना ऐसी भी होती थी कि कहीं इन सब से मन विचलित न हो जाए और पढाई की एकाग्रता भंग न हो जाए तदानुसार उन लोगो के लिए जिल्द पर वीणा पकड़े हंस के साथ वाली सरस्वती माँ वाले नोट बुक भी उपलब्ध होते थे। जो सरस्वती जी के कृपा के कोप भाजक थे, वे परम परमेश्वर के दूसरे रूप जैसे हनुमान जी या मनोकामना पूरी करने वाले किसी और देवी देवता के जिल्द पर बने चित्र वाले नोट बुक की तरफ आस्था प्रकट करते थे। 

कुल मिला कर चयन करने वाला कैसी जिल्द वाली नोट बुक खरीदता था, काफी हद तक वह उसके मानसिक स्थिति का द्योतक होता था। 

Welcome back to 1986-90

बचपन में मेरे पास एक मिटटी का बना हुआ गुल्लक था।  जब भी मुझे कही से कोई सा भी खुदरा सिक्का मिल जाता, मैं उसमें डाल दिया करता था। समय बीतता चला गया और मैं गुल्लक को बिलकुल भूल सा गया था। घर में कोने के एक शेल्फ पर बरसों से वह धूल खाते पड़ा रहा।

ज़िंदगी अपनी पूरी रफ़्तार से आगे और बहुत आगे निकल गयी - इस बात से बिलकुल बेफिक्र की उस गुल्लक का क्या हुआ। फिर एक दिन जब ज़िंदगी जरा थक सी गई , और सुस्ताने लगी,  तो ख्याल आया कि उस गुल्लक को तोड़ के देखा जाए कि आखिर उनमें कितने सिक्के हैं? और जब उसे तोड़ा, तो पाया की उसके अंदर ऐसे सिक्के मिले जो अब बाजार में नहीं चल सकते थे। सिक्के पुराने नही हुए थे - या हो गए थे?

फिर मैंने हर एक सिक्के को गौर से देखा - अल्बम के किसी पुराने पीली पडी तस्वीर सी - आज के रंगीन जमाने के सामने बेरौनक सी-  पर जब भी देखो - मूक तस्वीरें बहुत कुछ कहती सी!  मेरे अतीत से H 2 O की तरह जुड़े से । बाजार का तो पता नहीं, पर मेरे लिए, वे सभी सिक्के तो अब एक बेशकीमती धरोहर से बन गए थे।  हरेक सिक्के, जुगनू बन कर, बीते क्षणों की यादों को टिमटिमाते और भीनी भीनी खुशबू लिए से! पुराने, पर सिक्कों की खनखनाहट में अब भी वही ताज़गी, ज़िंदगी जिसे सुनकर गुलज़ार के लिखे वो गीत गा उठती -