सुनहरी यादों के चिराग से निकला - Mech '86 का जिन्न - २

अब तक आपने हमारे Mechanical '८६  के आधे लोगो के बारे में यहाँ पढ़ा था और अगर आप इसे पढ़ रहे हैं तो जाहिर है बाकी के बारे में भी जान ने को काफी उत्सुक होंगे, तो बिना किसी और रूकावट के इधर हाज़िर है  - दूसरा भाग - 
३६. प्रदीप कुमार चौधरी -  दीपू , अब इस दुनिया में नहीं रहे! यह अत्यधिक दिल को दुखाने वाला अनुभव है। आज भी मैं जब उसे याद करा रहा हूँ तो ऐसा लगता है कि वो अब भी यही कही अगल बगल है! यकीन ही नहीं होता की अब वो कभी नहीं मिलेगा! दीपू बहुत ही संवेदनशील और कम बोलने वाले लोगो में से था। दीपू अनजाने में भी किसी का अहित नहीं कर सकता था! काम बोलता था मगर जब भी कुछ बोलता था - उसमे हंसी के इतने पुट होते थे कि आज तक उसकी बातों पर हंसी आती है! हमेशा मुस्कराता से, पर कही खोया और अकेला सा रहता था। कॉलेज के दिनों में पढाई में ज़रा पिछड़ जाने के बाद इसने अदम्य साहस का परिचय दिया और इतनी पढाई की कि बाद में यह प्रोफेसर ही बन गया था!

सुनहरी यादों के चिराग से निकला - Mech '86 का जिन्न -१

आम तौर पर - "ज़िंदगी के सफर में गुज़र जाते हैं जो मकाम, वो फिर नहीं आते" के तर्ज़ पर, कॉलेज से एक बार घोंसला छोड़ के निकल जाने के बाद, सभी लोग आज़ाद पंछी की तरह दूर गगन में -बहुत दूर के सफर में निकल जाते हैं ! ऐसे में मुलाकात की सम्भावना कम ही रह जाती है। ऐसे ही कारणों से हमें भी एक दुसरे के बारे में कॉलेज से निकलने के बाद, करीब २० सालों तक कुछ ख़ास पता नहीं था।

BIT के '८६ सत्र में वाकई बहुत ही अलग किस्म के लोग थे! पर अनेको कारणों से, हमारे Mechanical '86 में और भी खुछ ख़ास हुआ करता था। कॉलेज के दिनोंं में भी Mechanical बदनाम से थे, क्योंकि अगर कैंपस में कहीं भी 'निकम्मों' का कोई झुण्ड दिख जाता था, तो बहुत ज्यादा संभावना थी कि उनमे ज्यादातर Mechanical का ही कोई न कोई होगा। कॉलेज में 'आवारागर्दी' करते हुए , जाने कब सभी ठीक ही ठाक से pass कर गए। कॉलेज से निकलने के बाद, Mech '86 के सभी भक्त-जन, दुनिया के अनेकों कोने में बिखर गए हैं!

वैसे तो मैं अपने बैच के सभी लोगों के साथ बहुत मस्ती की थी, पर अपने ब्रांच के लोगों के साथ ज्यादा समय बिताया। इस कारण, उनसे कुछ ज्यादा घनिष्टता बढ़ गयी थी। शायद इसका कारण यह हो सकता है कि हमें - 'मज़बूरी' में - सेशनल, प्रोजेक्ट और अन्य क्रियाकलापों के कारण - ज्यादा समय, एक साथ गुज़ारना पड़ा था।

BIT आश्रम के विशेष - 'ओशो' महात्म्य

आपको ज्ञात होगा कि कुछ दिनों पहले, मैंने आप सबों का अपने हॉस्टल के ओशो से परिचय कराया था। ओशो के बारे में मेरे एक पुराने मित्र ने याद दिलाया कि जरूर लिखना कि उनका एक प्रसिद्द डायलाग होता था -
ओशो न जन्म लेता है न मरता है, बस अमुक तारिख से अमुक तक इस धरती का सैर करने आता है।
सर्वथा, हमारे ओशो के लिए यह उपयुक्त बैठता था, कैंपस में उनका वजूद सिर्फ महसूस किया जा सकता था -जो आज तक समझ में नहीं आया कि - कब, कैसे और कहाँ से कहाँ तक- बस सिर्फ हो गया, और ४ साल ख़त्म हो गए!

आज मैं ओशो के महात्म्य से आपका परिचय कराता हूँ।

BIT कैंपस - 'जिम'

BIT के कैंपस के उत्तरी दिशा में 'जिम'- अर्थात व्यायामशाला है। कैंपस के ज्यादातर भवनों की तरह, इसका निर्माण भी काफी महत्वाकांक्षी लगता था परन्तु रख रखाव के आभाव में उसकी व्यवस्था देख कर लगता था कि  - "हाथी चला गया, हथिसार चला गया - फिर भी हम हाथ में सीकड़ लिये हुए हैं, कि हमारे दरवाजे पर कभी हाथी था।"


 ज्यादातर समय जिम बंद ही रहता था। टूटे फूटे दरवाज़ों में लगे शीशे से अंदर देखने पर, निर्जीव अवस्था में, कुछ व्यायाम के अस्त्र शस्त्र पड़े दिख जाते थे। सामने बरामदे के रेलिंग पर बैठ कर, पैर झूलाते हुए साथ में सिगरेट पीने का आनंद अद्भुत था। बरामदे से विहंगम दृश्य को देखते हुए सामने मैदान के आगे एक बहुत बड़ा खाली हिस्सा दीखता था। रावण दहन के समय खड़े किये पुतले की तरह - बिजली के बड़े बड़े खम्भे, एक दुसरे से बराबर दूरी बनाये, क्षितिज के खालीपन को कम करने की जिम्मेदारी उठाये हुए थे। रेलवे के ट्रेक से लगे हुए बहुत सारे ताड़ के वृक्ष मैदान के सरहद को निर्धारित करती से दिखते थे। सामने सिंदरी फ़र्टिलाइज़र का बहुत ऊँचा चिमनी दीखता था जहाँ से अक्सर गहरा गाढ़ा धुँआ निकलता रहता था।

BIT की मेस-व्यवस्था

BIT के मेस को उसके शाब्दिक अर्थ के रूप में ही लेना चाहिए थे - अतः उनकी अवस्था वाकई messy ही होता था। अलग अलग हॉस्टल में मेस के आकार और प्रकार में थोड़ा बहुत फेर बदल होता था, पर मूल रूप से इनका मकसद, हॉस्टल में रहने वाले निवासियों के खाद्य आपूर्ति से सम्बन्धित होता था। परन्तु साथ ही मेस का भू-खंड, मेस सर्वेन्ट्स के रहने के लिए भी प्रयोग में आता था। इस कारण वहां दोपहर या रात के समय रेलवे प्लेटफार्म वाली स्थिति होती थी - जब धरती के समतल होने के प्रमाण स्वरूप एवं स्वयं को जमीन से जोड़े रखने वाले कहावत की, जमीनी हकीकत के तौर पर - सभी मेस के कर्मचारी वहां सोये नज़र आते थे। थोड़ी दूर पर मनुष्य का सदियों से बना साथी- कुत्ते- भी साथ देते हुए, फ्री-स्टाइल में सोते नज़र आते थे। रात की सिगरेट ख़त्म हो जाने के बाद, कई बार इनके पास जाकर बीड़ी मांग कर पीने के दौरान, इनके सोने के अंदाज़ का दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ था।

आज़ाद भारत के प्रशासन व्यवस्था के तर्ज़ पर, हमारे कॉलेज में भी फर्स्ट ईयर के दौरान मेस की व्यवस्था का बागडोर -'वॉयसराय' वार्डन- के हाथों था और सेकंड ईयर से हम स्वावलम्बी हो गए थे। अंग्रेज़ों से मिले भारत में, भाषा के आधार पर बने राज्यों की तरह, हॉस्टल में रहने वाले अलग अलग ब्रांच ने मेस के रूप में - अपनी सार्वभौमिकता प्राप्ति के उद्देश्य को पूर्ण कर लिया था। कई होस्टल में ब्रांच के आधार पर विभाजन जैसे विचारों से ऊपर उठ कर, शाकाहारी एवं मांसाहारी भोजन के मौलिक भिन्नता के आधार पर भी, अलग मेस चलाने का प्रचलन था।

BIT आश्रम के विशेष - 'ओशो' परिचय

हर युग में धरा पर किसी न किसी युगपुरुष का आगमन होता है । हर बैच में भी कुछ ऐसे छात्र होते थे, जो इनके समकक्ष से होते थे। जिस प्रकार शांति का नोबेल पुरस्कार अक्सर किसी संस्था को दिए जाने का प्रचलन होता है - उसी तर्ज़ पर कैंपस में भी जो झुण्ड में इस तरह के महापुरुष इकट्ठे मिल जाते थे, उन्हें भी एकत्रित रूप से हमारे लिए युग-निर्माण करने का श्रेय मिलना चाहिए। वैसे, हमारे बैच में इस तरह के अवतारों का चेरापूंजी सरीखे मूसलाधार हुआ था।

कैंपस की याद आते ही, इन महानुभावों का व्यक्तित्व, और उनकी गतिविधियाँ - जो उन दिनों भी मेरे मस्तिष्क के सभी तंतुओं को झंकृत कर दिया करता था - और आज इतने बरसों बाद भी जब पुराने साथियों के व्हाट्सप्प ग्रुप पर पुराने दिनों की चर्चा होती है, इन सबों का शब्दों से सचित्र वर्णन होना अनिवार्य सा है। मेरे स्मरण में अपने बैच के वैसे सभी विशेष व्यक्तित्वों का,  डॉक्यूमेंटरी सा बना हुआ है, जिनका इन - ब्लॉग के माध्यम से -  'प्रीमियर शो' करने का प्रयास कर रहा हूँ।

आज की कथा समर्पित है - ओशो * को -

कैंपस के वो हसीं लम्हे… भाग 7 - सुदामा

एक बहुत ही रोचक पात्र का रामायण में वर्णन आता है जो निस्स्वार्थ भाव से सेवा करते हुए स्वयं को धन्य समझता है, जिसने प्रभु को नदी पार कराने के पारिश्रमिक के रूप में उनके चरणो को धोने का काम ही माँगा था । जब मैंने पहली बार इस पात्र के बारे में पढ़ा, तो स्वयं से प्रश्न किया कि क्या केवट सिर्फ एक काल्पनिक पात्र था या वास्तविक जीवन में भी कोई ऐसा होता होगा जो अपने काम के प्रति इतना समर्पित होता हो।

BIT के हॉस्टलों में रहते हुए हम कई मायनों में वार्ड सर्वेंट्स पर लगभग आश्रित से हो गए थे। आम तौर पर हमें सुबह उठते ही चिल्ला कर उन्हें बुलाने की या डाँटने की लगभग आदत सी हो गयी थी। वार्ड सर्वेन्ट्स भी बाबुओं की कमज़ोरी जानते थे और उन्हें पता था कि उनकी सबसे ज्यादा जरुरत सुबह होती थी, जब लोगों को पीने का पानी, कमरे में झाड़ू लगाना और बाकी दिन भर के कुछ और काम बताने की जरुरत होती थी।

कैंपस के वो हसीं लम्हे… भाग 6 -फल वाला

Hostel में खाने की समस्या, बचपन में समाज शास्त्र में पढ़ाये जाने वाला विषय - "भारत के पिछड़े होने के अनेक कारणों में से प्रमुख खाद्यान की आपूर्ति में आत्म-निर्भर न होना" का ही एक सूक्ष्म रूप में व्यापक समस्या का द्योतक था. कैंपस में और हॉस्टल में और भी अनेक तरह की समस्याएं होती थी परन्तु - रोटी, कपडा और मकान में से ऐसा प्रतीत होता था कि हमारे लिए तीसरे की समस्या तो नहीं थी, परन्तु हमारे "मकान" में जल का नितांत अभाव रहता था और हमारे जीवन में हैंड पंप के महत्व का ज्ञान प्राप्ति हुई.

जहां आभाव है वहीं विकल्प भी पनपते हैं. इस क्रम में, हर समस्याओं का निदान के रास्ते बनते चले गए और ४ साल कैसे पार हो गए हमें पता भी नहीं चला. हॉस्टल के खाने की समस्या का निदान को, तीन सतहों पर समझना पड़ेगा -

कैंपस के वो हसीं लम्हे… भाग 5 - संजय वार्ड सर्वेंट

Hostel # 3  का शायद सबसे कम उम्र का एक वार्ड सर्वेंट हुआ करता था- संजय। सेना के नए रंगरूट सा बिलकुल चुस्त और फुर्तीला सा संजय तड़के सभी रूम को खटखटाता था और अगर खुला तो झाड़ू लगाता वरना आगे बढ़ जाता और आनन फानन में सभी रूम के बाहर रखे बाल्टी में हैंड पंप से पानी को भरता हुआ सबसे पहले हॉस्टल से गायब हो जाया करता था.

देर से उठने वाले प्राणियों को गुस्सा आता था क्योंकि कइयों को सिगरेट मंगवाना होता था या कोई और काम. कई बार सुदामा, जो उसी हॉस्टल का एक दूसरा वार्ड सर्वेंट हुआ करता था वही उसके हिस्से का काम कर दिया करता था.

अचानक से एक दिन खबर आया की संजय ने मैट्रिक का इम्तिहान पास कर लिया है. विषमताओं के बीच इस तरह के अदम्य साहस, उसकी लगन, निष्ठा और कड़े मेहनत को याद कर आज भी जी करता है कि उसे गले से लगा लूँ और उस से प्रेरित हो कर कुछ मैं भी ताकत पा लूँ!

कैंपस के वो हसीं लम्हे… भाग 4 -अवधी दरबान

BIT कैंपस में पहली बार जब भी कोई कदम रखता, उसकी नज़र सबसे पहले हॉस्टल १,२,३ पर पड़ती थी जो अंतिम वर्ष के छात्रों के लिए होता था. इन तीनों हॉस्टल का विश्लेषण बचपन में गाय पर निबंध लिखने के लिए सिखाये गए उन सभी पहलुओं से बिलकुल ही तर्कसंगत बैठता था :

१. जैविक - चार साल घिस लेने के बाद अकेले कमरे में रहने की स्वतंत्रता,
२. सामाजिक - इस हॉस्टल के सामने से मेन रोड जाने के कारण कम से कम अंतिम वर्ष ये एहसास कराना आवश्यक है कि अब छात्र कॉलेज से निकल कर वापस समाज में एक जिम्मेदार नागरिक की तरह जीवन यापन करने जा रहे हैं,
३. प्रासंगिक - आम तौर पर कॉलेज के सेशन की हालत भारतीय रेल की तरह ही रहती है और अंतिम साल के ऊपर उसैन बोल्ट की तरह पूरी दम ख़म लगा के जीताने का लक्ष्य होता है जिस कारण देर शाम और सप्ताहांत में भी क्लासेज होती रहती हैं और कैंपस के बीचो बीच रहने से समय और दूरी की बचत होती है

कैंपस के वो हसीं लम्हे… भाग 3 -मिठाईवाला

BIT का कैंपस बहुत विस्तृत क्षेत्रफल में फैला हुआ था। हरेक होस्टल "राम राज्य" की तरह, ताला संस्कृति से विरक्त, बिलकुल खुला सा होता था। बावजूद इसके, कैंपस से बाहर के तत्त्व, जिन में युद्ध विराम का प्रस्ताव ले के जाने वाला जैसा आत्म-विश्वास होता था, वैसे फेरीवाले ही अपना सामान बेचने हॉस्टल के अंदर या आसपास आते थे.

कुछ फेरीवाले हॉस्टल ११ (girls hostel) की तरह अपवाद थे। वे अपने लिए स्थाई जगह बना लिए थे, जैसे गन्ने का रस निकालने वाला या कैंटीन के बगल का पान दुकान, परन्तु बाकी घूम घूम कर अपने सामान को बेचते थे.

कैंपस के फेरीवाले का बिजनेस मॉडल और चरित्र रेलवे स्टेशन के फेरीवालों से मिलता जुलता था, ट्रेन के रुकते ही सामान बेचने का सिलसिला शुरू हो जाता था. कुछ जो सिर्फ आम छात्रों की तरह पढाई की खाना पूरी करने कॉलेज आये थे, वे ट्रेन के एक सिरे जो गार्ड का डिब्बा होता था, उस छोर से इंजन तक का एक चक्कर लगा के end term exam की तरह अगले ट्रेन के रुकने का इंतज़ार करते थे. मगर मेघावी छात्रों की तरह, कुछ फेरीवाले स्टेशन पर जब तक ट्रेन रुका हो, तब तक जितनी बार संभव हो एक सिरे से दूसरे सिरे का चक्कर लगाते ही रहते थे, ये पुनरावृति का सिद्धांत "जिन ढूँढा तिन पाइयाँ, गहिरे पानी पैठ।जो बौरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ॥" से प्रेरित था। मेघावी छात्रों का भी विश्वास होता था कि जितनी बार डुबकी लगाएंगे, उन्हें कोई नए ज्ञान की प्राप्ति होगी। परन्तु मेरे जैसे विद्यार्थी को, पानी से ही बहुत डर लगता था, और हमारे जैसों के लिए नदी के चक्कर में न पड़ कर बस उसे पार कर अगले किनारे तक जाना ही मकसद था! हॉस्टल में आने वाले कुछ फेरीवाले भी थे, जो दिन में कई मर्तबा चक्कर लगाते रहते थे की क्या जाने कोई नया खरीद हो जाए !

कैंपस के वो हसीं लम्हे… भाग २ - रमण सिंह

Hostel - 13 में एक वार्ड सर्वेंट होता था रमण सिंह जिसने पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए घर में अनगिनत बेटियाँ के झुण्ड लगा दी थी.

पैसे की तरह बाल की भी कमी सा गंजा सिर, हफ्ते में एकाध बार याद आने से शेविंग करने वाली स्थिति से झलक रही विवशता की तरह पचके गाल और उन पर बेतरतीब बढे समस्याओं सी दाढ़ियाँ! मगर लगान सिनेमा के बग्घा की तरह, जो भयानक गरीबी और सूखे को झेल रहे बस्ती में भी जश्न मानाने के जोश से नगाड़ा पीटता रहता था, लगभग उसी जोश और मुस्तैदी से उसके हौसला को दर्शाता उसकी लम्बी लम्बी मूंछे, जो उसके चेहरे को देखने पर एक राहत सी देती थी कि ज़िंदगी थकी जरूर है पर अभी रुकी नहीं है।

हॉस्टल के बाबुओं की सेवा में उतने ही जोश से तत्पर दुबला पतला मगर चुस्त सा रमण मौसम से मानो बेखबर हर वक़्त अपने शरीर पर एक पुरानी गंदी से ऊनी स्वेटर पहना होता था जो ऐसा लगता था कि उसके शरीर का वह एक अभिन्न हिस्सा बन चुका था.

कैंपस के वो हसीं लम्हे… भाग १ - B Zone के बाबा

BIT के दौरान कैंपस में अनेक तरह के लोग मिले थे पर कुछ ख़ास तरह के व्यकितत्व थे, जाने अनजाने यादों के झरोखे को जब भी खोलता हूँ बरबस इनकी यादें आंखो मे तैरने लगता है :

'बी' जोन के हॉस्टल १६ के मेन गेट से अंदर घुसते ही दाहिने और एक स्टोर हुआ करता था जो एक तरह से 'ए' जोन के मेहता स्टोर का एक पर्याय जैसा था। उस स्टोर में हर तरह के रोज़मर्रा की सामान मिलती थी जो 'बी' जोन के सभी हॉस्टल में रहने वाले के जरूरत आ सकती थी। आम तौर पर सेशनल के जर्नल कवर सबों के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता सी थी और वो यहाँ मिलता था। "टोपोलॉजी" के लिए आवश्यक टी स्क्वायर, इंजीनियरिंग ड्राफ्टिंग पेपर, एच, २-एच, एच बी से लेकर जापानी तकनीक से बनी लीड वाली, हर तरह के पेंसिल के प्रकार वहाँ मिलते थे। उस जमाने के हिसाब से प्रचलित तरह तरह के जिल्द लगे हुए नोट बुक भी वहां बिकता था।  


नोट बुक के जिल्द पर वैसे सभी विषयों के तस्वीरें होती थी जो मन को सदैव लालायित करता रहे कि जीवन में पढाई से हट के भी बहुत कुछ और करने को है। ज्यादातर किसी पसन्दीदा क्रिकेट खिलाड़ी, स्विट्ज़रलैंड या ऐसे ही किसी खूबसूरत जगह ,तोता, बाज़, मोर या कोई और पक्षी, किसी खूबसूरत प्रसिद्ध अभिनेत्री, बिलकुल एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन या किसी और अभिनेता के चित्रों का प्रचलन होता था।  

कुछ लोगों की भावना ऐसी भी होती थी कि कहीं इन सब से मन विचलित न हो जाए और पढाई की एकाग्रता भंग न हो जाए तदानुसार उन लोगो के लिए जिल्द पर वीणा पकड़े हंस के साथ वाली सरस्वती माँ वाले नोट बुक भी उपलब्ध होते थे। जो सरस्वती जी के कृपा के कोप भाजक थे, वे परम परमेश्वर के दूसरे रूप जैसे हनुमान जी या मनोकामना पूरी करने वाले किसी और देवी देवता के जिल्द पर बने चित्र वाले नोट बुक की तरफ आस्था प्रकट करते थे। 

कुल मिला कर चयन करने वाला कैसी जिल्द वाली नोट बुक खरीदता था, काफी हद तक वह उसके मानसिक स्थिति का द्योतक होता था।